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आत्महत्या के बाद

आत्महत्या के बाद

 

हां, मर गया हूं मैं।

एक आवेश मे लिए निर्णय से हार गया हूं मैं।

उस दिन उस १०/१० के कमरे में,मैं रो रहा था।

अपनी मन के चक्रवातों को झेल रहा था।

अपनी मनोस्थिति को कोश-कोश कर,

एक छोटे सपने के टूटने के बारे सोच-सोच कर,

अपने आप को हीन मान रहा था ।

फिर क्या, मैंने सोचा क्यों ना यह सब खत्म कर दूं,

और लिखा वह आखिरी खत

कि “अब मैं यह दुनिया छोड़कर जा रहा हूं।”

मेरी उस पंखे से टंगी लाश को देखकर मेरे पिता को तो यह विश्वास ही नहीं हुआ,

कि मर गया हूं मैं।

एक आवेश मे लिए निर्णय से हार गया हूं मैं।

हां, मर गया हूं मैं।

 

मैं तो उसी दिन मर गया था,

पर मेरे चाहने वाले आज भी रोज मरते हैं।

मेरी वह फटी हुई आंखें,

मेरी मां का फटा हुआ कलेजा बनकर आज भी जिंदा है ।

मेरे गर्दन की वो टूटी हुई नसें,

मेरे पिता के हृदय के वो टूटे हुए खामोश तार बनकर आज भी जिंदा है ।

मेरे गाल पर वो मेरे सूखे हुए आंसू,

मेरी बहनों के आंखों से आज भी निकलते हैं।

और, मेरे वो शक्तिहीन हाथ-पैर जो हवा में झूल रहे थे,

वह मेरे भाइयों के हिम्मत को आज भी थोड़ा करते हैं।

आज भी मेरी मां दरवाजे की ओर देखकर,

मेरा इंतजार करती है क्योंकि उन्हें भी अब तक यह विश्वास नहीं हुआ कि मर गया हूं मैं।

एक आवेश मे लिए निर्णय से हार गया हूं मैं।

हां, मर गया हूं मैं।

 

अब मैं सोचता हूं ,

कि यह कैसा हाल है ?

जिसमें अपनों का बर्बाद होता कल है।

सच कहता हूं,कि सफेद कपड़े में लिपटे अपने ही लाश के पास ,

सुध-बुध खोए मां- बाप को देखना बहुत मुश्किल होता है। रोती- बिलखती बहनों को देखना बहुत मुश्किल होता है। भाइयों को दहाड़े मारते देखना बहुत मुश्किल होता है।

तभी तो, सहम जाता हूं जब भी वह मंजर याद आता है। सोचता हूं ,काश उस दिन इनकी होठों के तबस्सुम के खातिर जी जाता ।

मेरे उन बाकी सपनों को पूरा करने के लिए जी जाता ।

या, अपने कला को विस्तार देने के लिए जी जाता ।

पर अब ,बहुत देर हो चुकी है क्योंकि मर गया हूं मैं।

एक आवेश मे लिए निर्णय से हार गया हूं मैं।

हां, मर गया हूं मैं।

 

(Poet : भुवनेश कुमार प्रधान)