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कबीर सिंह – फ़िल्म की सबसे अच्छी बात यही है कि ये परेशान भी करती है और मोटीवेट भी

कैमरा सीवर पर फोकस करता है. गन्दे गाढ़े बदबूदार कीचड़ से भरा हुआ सीवर. उसमें बुलबुले फूट रहे हैं. अचानक दर्शक चौंकता है और मैले को चीरता हुआ एक आदमी बाहर निकलता है. अब कैमरे का फोकस उस आदमी पर है. उसका मुंह आंख कान और पूरा शरीर मैले से लिपटा हुआ है. थिएटर में मेरे बगल में कॉलेज के स्टूडेंट्स बैठे हैं.. उनमें से एक के मुहं से निकलता है. “..छी”. दूसरा उसे झिड़कते हुए कहता है, “ऐसे ही साफ़ होता है नाला. देख लो” बात आई गई हो जाती है लेकिन निर्देशक अपना काम कर देता है. वो आज की युवा पीढ़ी के सामने उस तस्वीर को रख देता है जिसे नज़दीक से दिखाने की हिम्मत हमारे ज़्यादातर फ़िल्मकारों में नहीं है. या इसमें उनका फ़ायदा नहीं है. फ़ायदा अनुभव सिन्हा का भी नहीं था. क्या पड़ी थी उन्हें रिस्क लेने की. वो भी कोई ऐसी फिल्म बना सकते थे जिसमें दिमाग न लगता हो. उसमें ‘सुपरस्टार’ और ‘आइटम सॉन्ग’ का तड़का लगा सकते थे. दर्शकों को उसे देखने और समझने के लिए दिमाग का इस्तेमाल नहीं करना होता, न किसी की भावनाएं आहत होतीं और फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर पैसा पीट लेती. लेकिन फ़िल्म मेकर्स ने इससे इतर और कठिन रास्ता चुना. नतीजा आर्टिकल 15 के रूप में हमें एक ऐसी फिल्म मिली जो कला को इसके उच्चतम रूप में प्रतिष्ठित करती है. यानि वंचितों की प्रेरणा बनती है और शासकों को असहज करती है. फ़िल्म की सबसे अच्छी बात यही है कि ये परेशान भी करती है और मोटीवेट भी.

फ़िल्म शुरू होती है एक लोकगीत से. “कहब त लग जाई धक से..” ये असमानता का गीत है, असंतोष का गीत है. इसमें क्रूर व्यवस्था पर तंज़ और असली आज़ादी की तड़प है. फ़िल्म की कामयाबी यही है कि इसके जरिए जो कहने की कोशिश की गई वो बात सही समय पर सही निशाने पर जाकर लगी है. धक से लगी है. गैरबराबरी पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की मलाई काट रहे लोग सड़कों पर आ गए, फ़िल्म की रिलीज़ का विरोध किया, कई जगह फ़िल्म चलने से रोक दी. निर्देशक को गाली दी, उसे धमकियां दी अपनी असुरक्षा और खीझ को कई तरह से ज़ाहिर किया. निर्देशक ने फिर से एक बार अपना काम कर दिया.

फ़िल्म के बारे में एक बड़ी विचित्र बात सुनी कि इसमें ब्राह्मण को हीरो के तौर पर दिखाया गया है जो उसी सवर्ण मानसिकता को पुष्ट करता है. लेकिन कैसे. फ़िल्म का नाम आर्टिकल 15 है जो संविधान से मिले समानता के अधिकार को एक आंदोलन के तौर पर स्थापित करने की कोशिश करता है. फिल्म के नायक को ये विश्वास है कि किसी विशेष जाति का होने के नाते वो किसी से श्रेष्ठ नहीं है. वो इन धारणाओं को पिछड़ापन मानता है. उसने इतिहास, संविधान के ज्ञान और अपने अनुभव से जो सीखा है उसकी सोच और उसके काम में वही झलकता है. फ़िल्म राजनीतिक पार्टियों के ब्राह्मण-दलित एकता जैसे भुलावे को ढोंग करार देती है. राजनेताओं के दलित बस्तियों में जाकर खाना खाने वाले षड्यंत्र को उजागर करती है. सीधे जाति के जड़ पर प्रहार करती है. लेकिन इन सबके बावजूद अगर नायक की जाति से समस्या है तो ये उसके साथ ज़्यादती है. इसी ज़्यादती का शिकार होते हुए मैंने कन्हैया कुमार जैसे युवाओं को भी देखा है. एक और बड़ी दिलचस्प बात है कि फ़िल्म का नायक जाति व्यवस्था की जड़ों और उसके दंश को समझने के लिए आसपास मौजूद लोगों की जाति पूछता है लेकिन इस बातचीत को आधार बनाकर उसे ही जातिवादी घोषित कर दिया जाता है. ऐसा असलियत में भी होता रहा है. फ़िल्म के अंत में आयुष्मान खुराना का डायलॉग याद कीजिए, “अम्मा.. कऊन जात हो ?”

फ़िल्म में दलित आंदोलन को हाईजैक कर चुके और उसी की कमाई खा रहे नेताओं को भी एक्सपोज़ किया गया है. ज़ीशान अय्यूब के संवाद और उनकी संवाद अदायगी मुझे याद रह गई. भगत सिंह-अंबेडकर से प्रभावित उनका किरदार उभरते हुए युवा दलित नेताओं से लेकर रोहित वेमुला तक की याद दिला जाता है. फ़िल्म बहुत सारी सच्ची घटनाओं और सच्चे कैरेक्टर्स को छूकर निकल जाती है लेकिन इस प्रक्रिया में न कहीं अपनी गम्भीरता खोती है और न सम्वेदनशीलता. गौरव सोलंकी और अनुभव सिन्हा को बधाई.

#Article15

शुभ्रा सुमन (जर्नलिस्ट)