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चुनावी भोपू :- ढाई अक्षर सत्ता के

 

कुर्सी कुर्सी जग लड़े  कुर्सी न मिलया कोए।

ढाई अक्षर सत्ता के पढे से सांसद होए।।

आपने अक्सर प्रेम मे पड़े लोगो का पैचअप और ब्रेकअप होते तो देखा होगा लेकिन अब उससे ज्यादा ये दृशय राजनीति मे देखने को मिलता है. कभी एक दूसरे के साथ कदम से कदम मिला कर चलने का वादा करते है तो कभी पद के लालच मे उसी कदम को पीछे कर लेते है .

बीते दिनो मे जब राजाओ का शासन होता था तब भी कई बार मंत्रियो को लालच देकर दूसरे राज्य मे शामिल किया जाता था. लेकिन अक्सर ये भी होता था की अपने से उच्च पद ओर मुद्रा पाकर भी कुछ लोगो को अपनी प्रजा से गद्दारी मंजूर नहीं होती थी. लेकिन आज के वर्तमान काल मे इसका ठीक उल्टा देखने को मिलता है. अक्सर कई बड़े नेताओ को अपनी पार्टी बदलते देखा जा रहा है और अब तो मानो ये आम सी बात हो गयी है .

ये विषय समझ से बिलकुल परे होता है की कैसे एक समय पर एक पार्टी मे रहकर उसकी वाहवाही एवं विरोधी दलो की बुराई करते है. वही दूसरी ओर जब उसी पार्टी को छोड़ दूसरे मे शामिल होते है तो ठीक वैसा ही उस पार्टी के साथ होता है यानि उसकी बुराइयाँ चालू हो जाती है. इसका तात्पर्य यही की जब तक संग है रंग है, अब अपना अंगूर किसी को कहा खट्टा लगता है, और ठीक उससे छूटते ही बुराइयाँ दिखनी चालू हो जाती है .

अगर आम जनता के मानसिक स्तर पर बात की जाए तो किसी पार्टी का कोई एक व्यक्ति जनता को तब तक प्रिय होता है जब तक वह उनकी पसंदीदा पार्टी मे हो मगर पार्टी से विमुख होते ही जनता भी उनमे बुराइयाँ ढूंढ ही लेती है. ठीक इसी प्रकार जनता एक पार्टी को सिर्फ इसलिए सपोर्ट करती है क्यो की उसका कोई पसंदीदा उम्मीदवार उस पार्टी से ताल्लुख रखता है मगर जैसे ही वह उस पार्टी से नाता तोड़ता है जनता भी उस पार्टी का समर्थन करना छोड़ देती है.

कई बार यह भी होता है की अपने आशा के मुताबिक सम्मान और पद न प्राप्त होने के कारण भी पार्टी छोड़ना उनकी मजबूरी हो जाती है. जो जनता और पार्टी दोनों पर ही अच्छा या बुरा असर डालती है. खबर तो यह भी थी एक कोई पार्टी बकायदा रणनीति बनाकर दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओ को अपनी पार्टी मे शामिल करने का प्रयास कर रही थी, और कई नेताओं ने यह भी स्टेटमेंट दिया था की मैं तो पैदा ही उस पार्टी मे रहने के लिया हुआ हूँ, इससे पूर्व वाली पार्टी मे शामिल तो बस तजुर्बे के लिए हुआ था.

यह तो फिर वही बात हुई “तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई”. अब कारण कुछ भी हो बात है जनता के भरोसे की, जब खुद नेता अपनी पार्टी मे सालो रहने पर भी भरोसा नहीं कर पा रहे है, ऐसे मे जनता किसी को अपने एहम 5 साल कैसे दे ?

स्वाति तिवारी

संपादक