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वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष्य मे मृगेंद्र बाबू बहुत याद आते हैं

आज एक ओर राजनीति मे आरोप,  व्यक्तिगत लांछन, भ्रष्टाचार और चुनावी जूमले हावी है वही मृगेंद्र बाबू का राजनीतिक जीवन  और आचरण आज भी प्रासंगिक है. मृगेंद्र बाबू को राजनीति विरासत मे मिली थी . देश के प्रख्यात स्वतन्त्रता सेनानी ओर बिहार के भूत पूर्व मुख्यमंत्री सरदार हरिहर सिंह के पौत्र और चौंगाइ स्टेट के जमींदार एवं स्वतन्त्रता सेनानी बिहारी सिंह के पुत्र मृगेंद्र प्रताप सिंह का जन्म 10 अप्रैल 1939 को हुआ था.

मृगेंद्र बाबू ने टाटा मोटर्स कंपनी मे एक मजदूर के रूप मे अपनी ज़िंदगी की शुरुवात की बाद मे एक सशक्त मजदूर नेता के रूप मे उन्होने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुवात की और जमशेदपुर पश्चिमी विधान सभा से विधायक चुने गये. 1980 मे जब देश मे इंदिरा गांधी की लहर थी तो वे मात्र 58 वोट से चुनाव हारे थे मगर 1985 मे तत्कालीन विधायक शमसुदीन खान को 1458 वोटो से हराकर वे बीजेपी के विधायक बने. झारखंड राज्य गठन के बाद राज्य के पहले वित्तमंत्री और बाद मे झारखंड विधानसभा सभा के अध्यक्ष बने.

मृगेंद्र बाबू द्वारा किए गये उल्लेखनीय कार्य –

  • 1995 मे तत्कालीन बिहार विधानसभा के मॉनसून सत्र मे जमशेदपुर और बोकारो को इंडस्ट्रियल सिटि घोषित करने का प्रस्ताव उन्होने लाया था जिस मामले को लेकर सूप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दिये है.
  • मानगो गांधी मैदान मे महात्मा गांधी की प्रतिमा, साकची जेल चौक मे झारखंड का पहला दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा, मानगो गोलचक्कर मे खुदीराम बोस की प्रतिमा, शहीद भगत सिंह की प्रतिमा.
  • मानगो हनुमान मंदिर के सामने सरकारी 10 बेड वाली पहली डिस्पेन्सरी.
  • अपने विधान सभा क्षेत्र मे 52 सामुदायिक भवन.
  • आज़ाद नगर चेपापुल के पास शहीद अशफाक़ उल्ला खान गेट का निर्माण.
  • झारखंड के वित्तमंत्री रहते हुए तीन बार लाभ का बजट पेश किया.
  • मानगो पेयजल योजना की भगीरथ शुरुआत .
  • जमशेदपुर रेडक्रॉस भवन के लिए प्रयास॰

 

एमपी सिंह एक कुशल साहित्यकार भी थे उनके द्वारा कई किताबे और काव्य संग्रह भी लिखी गयी जिनमे अतीत के पन्ने, जय जवान जय किसान, हलफ़ी, पाखी बहुरंगी, स्वरतूलिका, अर्तस्वर आदी प्रमुख है. अपने कवि स्वभाव के कारण ही उन्हे साहित्य जगत मे मृगेंद्र प्रताप सिंह “श्रमिक” के नाम से जाना जाता था. मृदभाषी, कुशल राजनीतिज्ञ, जन नेता के रूप मे अपनी पहचान स्थापित कराने वाले मृगेंद्र बाबू आज हमारे बीच भले ही नहीं हो लेकिन उनका राजनीतिक आचरण आज भी अनुकरणीय है.