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“शब्दों की हो रही हत्या ” – राकेश कुमार पाण्डेय

कहने को तो शब्द ब्रह्म है, लेकिन वर्तमान समय में इस वाक्य पर प्रश्न चिन्ह लगते जा रहा है. आज के दौर में जिस तरह से शब्दों के साथ बालात्कार हो रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है. हम अपने दैनिक जीवन में इतने व्यस्त हैं कि अपने चारों ओर चल रहे शब्दों के वाण जिससे शब्द की आत्मा भी घायल हो चूकी है, उस और हमारा ध्यान नहीं जाता. खास कर के अगर राजनीति की बात करें तो, वहां तो शब्दों का महत्व खत्म सा हो गया है. आज वैसे शब्द जो अपनी करनी को सार्थक थे, उसको भी दूषित कर दिया गया है. उदाहरण स्वरुप अगर हम चौकीदार शब्द को लें , तो यह शब्द सुरक्षा का पैमाना माना जाता था. लेकिन आज इस शब्द को भी राजनीतिक स्वार्थ के लिए चोर की संज्ञा दी जाने लगी है, जो की शब्द के साथ अन्याय है. आप को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के बारे में अगर आरोप प्रत्यारोप करना है तो उस व्यक्ति के बारे में सीधे टिप्पणी करें यह आपका अधिकार है , लेकिन कुछ ऐसे शब्द जिसका अर्थ विश्वसनीयता का पर्याय हो उसको परिवर्तित नहीं करना चाहिए. आज राजनैतिक और सामाजिक जीवन में हजारों ऐसे शब्दों के साथ कुठाराघात किया जा रहा है, जो आने वाले समय के लिए न तो समाज हित में है और न हीं देश हित में.

आज जब पूरा विश्व विभिन्न प्रकार के समस्याओं से गुजर रहा है, उस समय में जो शब्द उनके अंदर नई उम्मीद और संवेदना उत्पन्न कर सकता है, उस तरह के शब्दों को हम अपने नीज स्वार्थ के लिए बर्बाद करने पर तुले हैं. इतिहास गवाह है कि मानव जब जब अपने स्वार्थ के लिए विश्वास और मूल्यों से समझौता किया है, तब तब वह विनाश का कारण बना है.

यह बात सही है कि समय के साथ बहुत सारे शब्दों के मायने बदल जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे शब्द हैं जिसका बदलाव समाज के अंदर स्वीकार नहीं है. मां , पिता, भाई , बहन, गुरु आदि अनेकों ऐसे शब्द हैं जिनका बदलाव संस्कृति के खिलाफ है. आज ऐसे शब्दों के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है. अगर इसी तरह से शब्दों के साथ मनमानी का दौर चलता रहा तो, वह समय भी आयेगा जब व्यक्ति के अंदर दुविधा बढ़ती जाएगी और संबंधों में विश्वसनीयता की कमी आती जायेगी.

मेरा मानना है कि समाज को इसके लिए आगे आना होगा और इस तरह के शब्दों के साथ अन्याय करने वालों का सामाजिक वहिष्कार करना होगा. इस तरह के मामले में मेरे विचार से न्यायायल को भी स्वत: संज्ञान लेना चाहिए तथा ऐसे लोगों को सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए. क्योंकी अगर शब्द ब्रह्म है तो उसकी गरिमा भी यथावत बनी रहनी चाहिए.