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कलम हाथ में है …….. !

” कलम हाथ में है, खंजर की जरूरत क्या है,
पढ़े — लिखे हैं, सलीके से कत्ल करते हैं !”

दरअसल इस दौर में ही नहीं बल्कि हर दौर में कलम से ज्यादा पैनी और तीखी तलवार कुछ और हुई ही नहीं । जब हम कलम कहते हैं तो स्वाभाविक तौर पर इस शब्द के साथ विचार भी जुड़े होते हैं ।
कलम ही वह जरिया है जो शब्दों को पन्नों पर परोसती है और विचारों को दूर तलक सैर करने की सहूलियत देती है । कदाचित् इसलिए बहुत ही जरूरी है कि हम कलम का उपयोग महज स्वार्थसिद्धी या ठाकुरसुहाते के लिए न करें बल्कि सच कहने – लिखने के लिए करें । हर दौर के लिए जरूरी है कि कलम बिके नहीं और न ही इसके हौसले में तनिक भी दरार आए । समाज के केंद्र में और व्यवस्था की नींव में कलम की ताकत और रौशनाई की चमक होती है ।
दिनकर जी ने भी वर्षों पहले हमें यह सवाल पूछकर सचेत किया था कि — ” दो में से तुम्हें क्या चाहिए, कलम या कि तलवार ?
मन में ऊंचे भाव की तन में शक्ति अजेय अपार ? ”

देखा जाए तो कलम प्रतीक है ज्ञान का, बौद्धिक क्षमता का और उत्कृष्ट मानवीय संवेदना का । आज के दौर के उथल-पुथल को देखें तो यह जरूरी है विचार जीवित रहें और विचार को स्वीकार करने का साहस भी । यदि ऐसा हो तो तलवार के लिए कोई जगह नहीं बचेगी । कलम भले ही सरहद पर जाकर देश की सरहद को महफूज नही रखती पर सीमा पर खड़े नौजवानों की धमनियों में देशभक्ति की लहर प्रवाहित होती रहे, इसका इंतजाम जरूर करती है । कलम देश के भीतर हमारे ऐतिहासिक गौरव और सांस्कृतिक मूल्यों को भी अक्षुण्ण रखती है ताकि राष्ट्र का चरित्र पूरे विश्व के समक्ष एक आदर्श बनकर रहे । आज की युवा पीढ़ी के लिए एक अवसर भी है और चुनौती भी कि वो कलम को सच बोलने और लिखने के लिए इस्तेमाल करें ताकि “जनतंत्र” में “जन” की बात उपेक्षित न रहे !!

डॉ कल्याणी कबीर
जमशेदपुर