Image

हरिवंश राय बच्चन – युवा कवियों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत

ज़्यादातर नवांकुरों की तरह मेरी भी लेखनी की शुरुआत तुकबंदियों से हुई। ग़ज़ल लिखने की भी कोशिश की। फिर धीरे-धीरे समझ आया कि ग़ज़ल लिखी नहीं कही जाती है और मेरी कहन शैली कुछ और है। मेरे गीत सृजन की क्षमता से मेरा परिचय पहली बार बच्चन जी ने ही करवाया। उन्हें पढ़कर ही मैंने इस विधा की नाज़ुकी और इसके सामर्थ्य दोनों को समझा। फिर तो जैसे बच्चन जी से मन ही जुड़ गया। शायद यही कारण है कि दिन भर तन और मन का दोहन करने वाली राजनीतिक व्यस्तताओं में घिरे होने के बाद भी यही अकुलाहट रही कि अपने प्रिय गीतकार की जयंती पर कुछ लिख सकूँ।

बच्चन जी मेरे आदर्श इसलिए भी हैं क्योंकि उनसे मनुष्य होना भी सीखा जा सकता है। मनुष्य जो गलतियाँ भी करता है किंतु अपनी सकारात्मकता से उन गलतियों को धूमिल कर देता है। वे कवि हुए तो ऐसे जिन्होंने हक की कमाई की कीमत करना सिखाया। गीतकार हुए तो ऐसे कि हाला में निरंकार ब्रह्म तत्व के दर्शन करा दिए। पति और पिता के रूप में भी आदर्श परिवार की इतनी सुदृढ़ नींव रखी कि वह दो पीढ़ियों बाद भी कायम है। मैंने जब बच्चन जी की आत्मकथा पढ़ी तो उनसे जुड़ाव और भी ज़्यादा हो गया। उनके हर एक सृजन के पीछे की कहानी और उन कहानियों में बसी टीस ने दिनों तक उलझाए रखा।

हर गीत के पीछे की कथा, श्यामा जी के साथ उनका रिश्ता, साथ होकर भी साथ ना हो पाने की कसक को उन्होंने यों उकेरा है जैसे घावों को कोई रिसने के लिए खुला छोड़ दे। क्योंकि कुछ घाव शायद ऐसे ही भरते हैं। सालों बिना मिले मीलों दूर से दिल का रिश्ता निभाना सरल नहीं होता। किन्तु “रात आधी खींच कर मेरी हथेली” और बच्चन जी की ऐसी ही कितनी रचनायें हमारा संबल बनीं।

मैं बच्चन जी पर लिखने बैठूँ तो सर्दी की लंबी रातें भी छोटी पड़ जायेंगी। उनसे रिश्ता ही कुछ ऐसा बन गया है। सो वह व्याख्यान फिर कभी।

– अर्पित ‘अदब’